रांची/पश्चिमी सिंहभूम(एजेंसी):जिन बीहड़ों और जंगलों से कभी गोलियों की तड़तड़ाहट और बारूद की गंध छनकर आती थी,वहां अब शांति लौट आई है।
झारखंड में सुरक्षा बलों के आक्रामक अभियानों,सटीक रणनीति और पुनर्वास नीतियों के कारण नक्सलवाद अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है।
जो संगठन कभी दर्जनों जिलों में समानांतर सरकार चलाने का दावा करते थे, वे अब गिने-चुने कैडरों और कुछ फरार कमांडरों तक सीमित हो चुके हैं।
लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है,क्योंकि खाकी की रडार पर अब भी ‘मोस्ट वांटेड’ चेहरे हैं। पूर्वी सिंहभूम में पुलिस ने छह माओवादियों के ठिकाने के बारे में जानकारी देने वाले को 1.34 करोड़ रुपये का इनाम देने की घोषणा की है।
सवाल यह है कि आखिर झारखंड के बीहड़ों में अब कितने नक्सली-माओवादी बचे हैं और इस लाल किले को पूरी तरह ढहाने में सुरक्षा बल कितने करीब हैं? आइए समझते हैं इसकी इनसाइड स्टोरी…
एक दौरा था जब झारखंड मे सारंडा के जंगलों में केंद्रीय समिति सदस्य, जोनल कमांडर, सब-जोनल कमांडर और एरिया कमांडर का खौफ था।
कई इलाकों में उनकी समानांतर सरकार चलती थी। लोग शाम ढलते ही घरों में कैद हो जाते थे। पुलिस अधिकारी, जवान और आम नागरिक नक्सलियों की गोलियों के शिकार होते रहे।
2002 में सारंडा के बिटकिलसोय और 2004 में बालिबा में हुए नरसंहार ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। नक्सलियों के बड़े हमलों ने पुलिस और सुरक्षा बलों को रक्षात्मक मोड में ला दिया था।
लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। सुरक्षा बलों ने कई बड़े ऑपरेशन चलाए, मुख्य कैंप बनाए, सड़कें बनवाईं और नक्सलियों को सरेंडर करने पर मजबूर किया। अब माओवादियों का प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है और सारंडा का जंगल शांति का अहसास करा रहा है।
- 52 माओवादियों के दस्ते सक्रिय (अतीत में)
- 26 साल तक रहा खौफ जंगलों में
- 2000 से 2006 के बीच माओवादी हिंसा में दर्जनों ग्रामीण मारे गए
- 1992 से 1996 के बीच नक्सलियों का धीरे-धीरे असर बढ़ा
1992 से शुरू हुआ था लाल आतंक का विस्तार (Jharkhand Maoist)
सारंडा में माओवाद का विस्तार अचानक नहीं हुआ। 1992 से 1996 के बीच नक्सलियों ने धीरे-धीरे इस इलाके में पैठ बनाई। धीरे-धीरे उन्होंने ग्रामीणों को एकजुट किया और अपनी पकड़ मजबूत की। 1999 के बाद सारंडा में हिंसा का दौर शुरू हुआ। इसके बाद 2002 में बिटकिलसोय और 2004 में बालिबा में बड़ी घटनाएं हुईं।
10 बड़े इलाके नक्सलमुक्त,सारंडा में भयमुक्त माहौल
झारखंड पुलिस की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 10 प्रमुख नक्सल प्रभावित क्षेत्र अब पूरी तरह से माओवाद से मुक्त कराए जा चुके हैं। ये निम्मलिखित हैं-
- माओवादियों का गढ़ माने जाने वाला छत्तीसगढ़-गढ़वा-लातेहार के सीमावर्ती बूढ़ा पहाड़ का क्षेत्र।
- कोल्हान का सारंडा, टोंटो, गोईलककेरा, पोड़ाहाट क्षेत्र।
- चतरा व पलामू का कोलेश्वरी क्षेत्र।
- गिरिडीह का पारसनाथ क्षेत्र।
- बोकारो का लुगु पहाड़ एवं झुमरा पहाड़ क्षेत्र।
- गुमला का चैनपुर व बिशुनपुर आदि पहाड़ी क्षेत्र।
- लातेहार का सरयू, गारू, महुआडांड़ आदि का जंगली क्षेत्र।
- लोहरदगा का पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्र।
- खूंटी का पश्चिमी/, दक्षिणी वन क्षेत्र।
- सरायकेला के कुचाई का जंगली क्षेत्र।
माओवादियों द्वारा की गई कुछ प्रमुख घटनाएं
31 मई 2004 को माओवादियों ने पुलिस चौकी पर हमला कर हथियार लूट लिए थे। इसके बाद 7 अप्रैल 2004 को बालिबा में सुरक्षा बलों के काफिले पर हमला किया, जिसमें 26 पुलिसकर्मी शहीद हुए और 30 से अधिक घायल हुए।
सारंडा के घने जंगलों में आईईडी और बारूदी सुरंगों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। 11 जून 2004 को रामगोड़ा के पास बारूदी सुरंग विस्फोट में 13 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे।
‘नवजीवन’ ने खोला बंदूक छोड़ने का रास्ता
पश्चिमी सिंहभूम पुलिस और केंद्रीय बलों (सीआरपीएफ, कोबरा, झारखंड जगुआर) द्वारा चलाए जा रहे अभियानों के बढ़ते दबाव और आत्मसमर्पण नीति के सकारात्मक परिणामों ने नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने पर मजबूर किया है।
वर्ष 2025 के बाद बदली रणनीति के तहत सुरक्षा बलों ने नक्सली क्षेत्रों में पिकेट स्थापित किए और तकनीकी इंटेलिजेंस का प्रयोग किया। जिला पुलिस ने आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के पुनर्वास की दिशा में बेहतर काम किया।
ऑपरेशन ग्रीन हंट से माओवादियों पर बढ़ने लगा दबाव
2010-17 के दौरान सारंडा में ऑपरेशन ग्रीन हंट और ऑपरेशन मेघाबुरु जैसे बड़े अभियान चलाए गए। इससे माओवादी बैकफुट पर आए और उनका जनाधार कमजोर होता गया। वर्ष 2002 में बिटकिलसोय में 12 जवानों और 2004 में बालिबा में 26 जवानों की शहादत जैसी खूनी घटनाओं को झेलने वाला सारंडा क्षेत्र अब सामान्य जीवन की ओर लौट चुका है।
सुरक्षा बलों द्वारा जगह-जगह पिकेट्स की स्थापना, विकास परियोजनाओं और ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ जैसे अभियानों से नक्सलियों का जनाधार पूरी तरह समाप्त हो गया है। एसपी अमित रेणू के कुशल नेतृत्व में सुरक्षा बलों ने सारंडा और कोल्हान के जंगलों में सर्च ऑपरेशन चलाकर नक्सलियों को बैकफुट पर धकेल दिया।
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी और बड़े कमांडरों का अंत
सुरक्षा एजेंसियों को सबसे बड़ी सफलता 28 जुलाई को मिली, जब संगठन की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली इकाई (पोलित ब्यूरो) के सदस्य और ₹1 करोड़ के इनामी शीर्ष माओवादी मिसिर बेसरा को उसके सहयोगियों के साथ गिरिडीह से गिरफ्तार कर लिया गया।
इसके अलावा, मुठभेड़ों में केंद्रीय समिति सदस्य पतिराम मांझी (अनल) जैसे ₹1 करोड़ के इनामी और अनमोल जैसे ₹25 लाख के इनामी नक्सलियों को ढेर किया जा चुका है।
कार्रवाई का रिपोर्ट कार्ड: गिरफ्तारियां और आत्मसमर्पण
15 अगस्त 2026 तक जारी आंकड़ों के अनुसार सुरक्षा बलों ने इस वर्ष बड़े पैमाने पर सफलता हासिल की है:
- कुल गिरफ्तारी: 113 माओवादी (भाकपा माओवादी, PLFI, TSPC और जेजेएमपी के कैडर शामिल)।
- मुठभेड़ में ढेर: 22 इनामी नक्सली। ( इस वर्ष 15 अगस्त तक राज्य में सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में 22 माओवादी मार गिराए गए। इन माओवादियों में मुख्य रूप से एक करोड़ रुपये के इनामी सेंट्रल कमेटी सदस्य अनल उर्फ पतिराम मांझी, 25 लाख रुपये का इनामी स्पेशल एरिया कमेटी सदस्य अनमोल उर्फ सुशांत, 15 लाख रुपये का इनामी रीजनल कमेटी सदस्य अमित मुंडा व सहदेव महतो उर्फ अनुज, दस लाख रुपये का इनामी जोनल कमांडर रंजीत गंझू व इजराइजल पूर्ति।)
- आत्मसमर्पण: राज्य में 50 नक्सलियों ने हथियार डाले (इसके अलावा झारखंड पुलिस के दबाव में पड़ोसी राज्यों छतीसगढ़, बंगाल और तेलंगाना में भी 12 माओवादियों ने सरेंडर किया)। (पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने वाले 50 माओवादियों में 46 भाकपा माओवादी व एक पीएलएफआई व तीन जेजेएमपी के माओवादी रहे शामिल। इनमें मुख्य रूप से 15 लाख का इनामी रीजनल कमेटी सदस्य संतोष उर्फ बासुदेव, 10 लाख रुपये का इनामी जोनल कमेटी सदस्य चंदन लोहरा, पांच लाख रुपये का इनामी जेजेएमपी का सब जोनल कमांडर सुरेंद्र लोहरा व माओवादी सागेन अंगरिया तथा गुलशन शामिल हैं।)
- बरामदगी: 111 हथियार, 9,904 कारतूस और नकदी जब्त।
अब सिर्फ 18 माओवादी फरार, 6 मुख्य चेहरों पर इनाम
पुलिस आंकड़ों के मुताबिक राज्य में अब केवल 18 नक्सली फरार सूची में हैं। सुरक्षा बलों का मुख्य ध्यान अब पूर्वी सिंहभूम और पड़ोसी राज्यों की सीमाओं में छिपे 6 प्रमुख नक्सलियों पर है, जिन पर कुल ₹1.34 करोड़ का इनाम घोषित है।
पुलिस हिटलिस्ट में सबसे ऊपर वो शीर्ष कमांडर हैं, जिनमें केंद्रीय समिति के सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश जैसे नाम शामिल हैं, जिन पर 1 करोड़ रुपये का भारी-भरकम इनाम है। पुलिस उपाधीक्षक दयानंद कुमार ने बताया कि छह माओवादियों के पोस्टर 25 स्थानों पर लगाए गए हैं।
उन्होंने लोगो से भी अपील की कि यदि इन माओवादियों के बारे में कोई भी जानकारी साझा करता है तो सूचना देने वालों के नाम गुप्त रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि माओवादी विरोधी अभियान तब तक जारी रहेंगे जब तक कि उन सभी को पकड़ नहीं लिया जाता या मार गिराया नहीं जाता।
नक्सली का नाम, पद / पहचान, घोषित इनाम
| नाम | पद | इनाम |
|---|---|---|
| असीम मंडल उर्फ आकाश | केंद्रीय समिति सदस्य | ₹1 करोड़ |
| राम प्रसाद उर्फ सचिन | वरिष्ठ कैडर | ₹15 लाख |
| मीता | दस्ता सदस्य | ₹10 लाख |
| मंगल सिंह सरदार | दस्ता सदस्य | ₹5 लाख |
| मालती मुर्मू | दस्ता सदस्य | ₹2 लाख |
| बुलू महतो | दस्ता सदस्य | ₹1 लाख |
सुरक्षा एजेंसियों ने इन फरारों की तलाश में पोस्टर अभियान शुरू किया है और सूचना देने वालों की पहचान गुप्त रखने का भरोसा दिया है। ‘मिशन ऑल-आउट’ के तहत सुरक्षा बलों का रुख स्पष्ट है—जब तक अंतिम नक्सली पकड़ा नहीं जाता या आत्मसमर्पण नहीं करता, अभियान जारी रहेगा।
क्या कहते हैं जिले के कप्तान
पश्चिमी सिंहभूम के पुलिस अधीक्षक अमित रेणू ने बताया कि सारंडा में नक्सलियों का प्रभाव अब नगण्य है। जो भी इक्का-दुक्का बचे हैं, उन्हें भी सुरक्षा बलों ने घेर रखा है। आत्मसमर्पण योजना और पुलिस के लगातार अभियानों के कारण नक्सलियों की कमर टूट चुकी है। क्षेत्र में पुलिस पिकेट्स और विकास कार्यों ने लोगों में भरोसा जगाया है। सारंडा अब भयमुक्त वातावरण में सांस ले रहा है।
झारखंड में लाल आतंक का सूरज अब पूरी तरह ढलने की कगार पर है—सुरक्षा बलों की सख्त घेराबंदी और ग्रामीणों के बढ़ते विश्वास ने यह साफ कर दिया है कि बीहड़ों में बचे गिने-चुने उग्रवादियों का अंत अब बस कुछ ही दिनों की बात है।





















































