दो हफ्ते में ईरान युद्ध खत्म होने का दावा, आगे क्या होंगी बड़ी चुनौतियां; कब तक संकट रहेगा बरकरार?

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नई दिल्ली(एजेंसी):पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि यह संघर्ष अगले दो हफ्तों में खत्म हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर युद्ध जल्दी खत्म भी हो जाए, तब भी दुनिया को ऊर्जा संकट से बाहर आने में काफी समय लग सकता है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी संकेत दिया है कि बिना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने के समझौते के भी युद्ध खत्म हो सकता है। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी तेल और गैस की सप्लाई में बाधा बनी रह सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अभी जो टैंकर समुद्र में फंसे हुए हैं, उनका असर आने वाले हफ्तों में दिखेगा। यानी आज की समस्या का पूरा असर अभी सामने आना बाकी है।

हालात सामान्य होने में लगेंगे 6 से 8 हफ्ते

अगर युद्ध दो हफ्तों में खत्म भी हो जाता है, तब भी तेल उत्पादन और सप्लाई को पहले जैसी स्थिति में लौटने में 6 से 8 हफ्ते लग सकते हैं। इसकी वजह यह है कि पहले जमा हुआ तेल जहाजों तक पहुंचाना होगा और फिर सप्लाई चेन को धीरे-धीरे सामान्य करना पड़ेगा।

युद्ध के दौरान तेल और गैस के इंफ्रास्ट्रक्चर को जो नुकसान हुआ है, उसकी मरम्मत भी समय लेगी। कुछ छोटे नुकसान जल्दी ठीक हो सकते हैं, लेकिन बड़े प्लांट्स को ठीक करने में महीनों या एक साल तक भी लग सकता है।

माइंस हटाना और शिपिंग होगी बड़ी चुनौती

युद्ध के बाद समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना एक बड़ी चुनौती होगी। यह काम न सिर्फ खतरनाक है बल्कि काफी समय लेने वाला भी है। साथ ही, जिन जहाजों को नुकसान हुआ है, उनका मलबा हटाना भी जरूरी होगा।

तेल ले जाने वाले बड़े जहाजों की शिपिंग लागत भी बहुत बढ़ गई है। युद्ध के दौरान इनका किराया 4 लाख डॉलर प्रतिदिन से ज्यादा पहुंच गया, जबकि कुछ मामलों में यह 7.7 लाख डॉलर प्रतिदिन तक भी गया। इसके अलावा ईंधन, पोर्ट चार्ज और अन्य खर्च मिलाकर लागत और बढ़ जाती है। ऐसे में शिपिंग रेट्स को सामान्य होने में 2 से 6 हफ्ते तक का समय लग सकता है।

युद्ध लंबा चला तो क्या-क्या होगी परेशानी?

अगर युद्ध दो हफ्तों में खत्म नहीं होता और लंबा चलता है, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। हर अतिरिक्त हफ्ता सप्लाई और कीमतों को सामान्य होने में 1 से 2 हफ्ते और जोड़ सकता है।

अमेरिकी एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, अगर 13 हफ्तों तक सप्लाई बाधित रहती है, तो उसे सामान्य होने में 8 हफ्ते तक लग सकते हैं। वहीं 26 हफ्तों तक संकट रहा तो रिकवरी में 3 से 4 महीने तक लग सकते हैं।

इसके अलावा यमन के हूती विद्रोहियों के शामिल होने की आशंका भी है। अगर उन्होंने बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को प्रभावित किया, तो वैश्विक सप्लाई पर और बड़ा असर पड़ेगा।

क्या होगा भारत पर असर?

यह संकट तब शुरू हुआ जब अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमले किए। इसके जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक कर दिया, जिससे दुनिया के 20-25% तेल सप्लाई पर असर पड़ा। इसका असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ा और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया। अमेरिका और यूरोप में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी हुई।

भारत पर फिलहाल इसका असर सीमित रहा है क्योंकि देश ने सप्लाई के कई विकल्प तैयार कर रखे हैं और रणनीतिक भंडार का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि प्रीमियम ईंधन और कमर्शियल गैस की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई है। वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे छोटे देशों में हालात ज्यादा खराब हो गए हैं, जहां ईंधन की कमी और महंगाई तेजी से बढ़ी है।

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