नई दिल्ली(एजेंसी):देशभर में भ्रष्टाचार के आरोपों के लिए चर्चा में रहे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने आखिरकार शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया। उनके नई दिल्ली स्थित बंगले में जले हुए नोट मिलने के बाद से वे सुर्खियों में बने हुए थे। मगर यह कोई पहला मामला नहीं है। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कुछ ऐसे न्यायाधीश भी हुए, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे और उन्होंने महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही इस्तीफा देकर पद छोड़ दिया। इन चार नामों ने लंबे समय तक सुर्खियां बटोरीं।
1. न्यायमूर्ति पीडी दिनाकरण
तमिलनाडु के मूल निवासी पीडी दिनाकरण सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे। उन पर कांचीपुरम जिले में करीब 197 एकड़ सरकारी और निजी जमीन हड़पने का गंभीर आरोप लगा। आय से अधिक संपत्ति रखने और पद के दुरुपयोग का भी मामला था। वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति की सिफारिश के समय ये आरोप सुर्खियों में आए। जांच समिति ने आरोपों को सही पाया। महाभियोग शुरू होने से ठीक पहले 29 जुलाई 2011 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
2. न्यायमूर्ति सौमित्र सेन
कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन पर 1983 के एक मामले में रिसीवर रहते हुए 33.23 लाख रुपये की हेराफेरी का आरोप लगा। कोर्ट द्वारा जमा राशि को उन्होंने अपने निजी खाते में डाल लिया था। राज्यसभा ने 2011 में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया। यह किसी न्यायाधीश के खिलाफ पहला सफल महाभियोग था। लोकसभा में सुनवाई से पहले 1 सितंबर 2011 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
3. न्यायमूर्ति दिलीप बी. भोसले
हैदराबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दिलीप भोसले पर प्रशासनिक अनियमितताओं और पक्षपात के आरोप लगे। हालांकि, उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई बड़ा ठोस मामला नहीं था। 24 अक्टूबर 2018 में अपनी सेवानिवृत्ति की तारीख पर ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। कई लोगों का मानना है कि यह कदम विवादों से बचने के लिए उठाया गया था। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि उन्होंने इस्तीफा विवादों से बचने और अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए दिया था। हालांकि, जस्टिस भोसले के मामले में अन्य तीन जजों की तरह स्पष्ट भ्रष्टाचार के सबूत नहीं मिले।
4. न्यायाधीश वी. रामास्वामी
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वी. रामास्वामी भारत के पहले ऐसे जज थे, जिनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई। उन पर पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए सरकारी धन के भारी दुरुपयोग का आरोप था। आलीशान फर्नीचर, विदेश यात्राएं और व्यक्तिगत खर्च सरकारी खजाने से किए गए। 1991 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया, लेकिन लोकसभा में यह पास नहीं हो सका। अंततः 1994 में बढ़ते दबाव के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफानामा में यशवंत वर्मा ने लिखी एक-एक बात
न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने पत्र में कहा, ‘इस्तीफा देने के लिए मजबूर किए जाने वाले कारण की वजह से मैं इस संस्था पर बोझ नहीं बने रहना चाहता और गहरी पीड़ा की वजह से इस्तीफा दे रहा हूं।’ उन्होंने महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने के बाद इस्तीफा दे दिया है। कानून के जानकारों का कहना है कि अब पार्लियामेंट्री कमिटी की जांच भी स्वत: ही समाप्त हो जाएगी।
क्या है जस्टिस वर्मा का पूरा मामला?
दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति रहने के दौरान उनके दिल्ली स्थित आवास में मार्च 2025 में कथित तौर पर नकदी जलने के बाद उनका स्थानांतरण दिल्ली हाई कोर्ट से वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था। यहां भी उनके स्थानांतरण का जमकर विरोध हुआ था।
विवादों से चर्चा में आने के बाद न्यायमूर्ति के गरिमापूर्ण पद से इस्तीफा देने वालों में अब यशवंत वर्मा का भी नाम शुमार हो गया है। हालांकि, जांच पूर्ण न हो पाने के कारण उन पर लगे आरोपाें की पुष्टि होना अब आसान नहीं है।





































