नई दिल्ली(एजेंसी):भारत में वन्यजीवों की बात हो और जिम कॉर्बेट का जिक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता है। एक समय था जब पहाड़ों पर रहने वाले लोग उनके नाम से ही राहत की सांस लेते थे। वे केवल एक मशहूर शिकारी ही नहीं, बल्कि प्रकृति से बेइंतहा प्यार करने वाले इंसान, एक बेहतरीन लेखक और वन्यजीव संरक्षण के बहुत बड़े समर्थक भी थे।
आइए, 25 जुलाई 1875 को जन्मे और 19 अप्रैल 1955 को दुनिया को अलविदा कहने वाले इस महान व्यक्तित्व की कहानी करीब से जानते हैं।
नैनीताल की वादियों में बीता बचपन
उत्तराखंड का खूबसूरत शहर नैनीताल कॉर्बेट की जन्मस्थली है। छोटी उम्र में ही सिर से पिता का साया उठ जाने के कारण उनकी मां ने ही उन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया। पढ़ाई-लिखाई नैनीताल के ही ‘ओक ओपनिंग्स स्कूल’ और फिर ‘शेरवुड कॉलेज’ से हुई। हालांकि, परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ इतनी जल्दी कंधों पर आ गया कि वे अपनी उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर सके और छोटी उम्र में ही उन्हें नौकरी करनी पड़ी।
जंगल ही था उनका पहला प्यार
कुमाऊं के घने जंगल और ऊंचे पहाड़ कॉर्बेट के लिए घर जैसे थे। बचपन से ही वे घंटों जंगलों में वक्त बिताते थे। इसी आदत ने उन्हें प्रकृति के इतने करीब ला दिया कि वे जानवरों की आवाजें, उनके पैरों के निशान और जंगल के तौर-तरीके बखूबी समझने लगे थे। उनकी जंगल की समझ इतनी पक्की थी कि बिना किसी आधुनिक उपकरण के भी वे जानवरों की हर हलचल का सटीक अंदाजा लगा लेते थे।
बीसवीं सदी की शुरुआत में उत्तराखंड के चंपावत इलाके में एक आदमखोर बाघिन का खौफ चरम पर था। लोगों ने डर के मारे खेतों में जाना, जंगल से लकड़ियां लाना और बच्चों को बाहर भेजना तक बंद कर दिया था। ऐसे मुश्किल वक्त में जिम कॉर्बेट ने मोर्चा संभाला। अपनी सूझबूझ, धैर्य और जंगल के अनुभव का इस्तेमाल करते हुए, उन्होंने 1907 में उस बाघिन को मार गिराया।
इसके बाद 1924 में, उन्होंने रुद्रप्रयाग के उस कुख्यात आदमखोर तेंदुए को भी ढेर कर दिया जिसने लंबे समय से गढ़वाल के लोगों की रातों की नींद उड़ा रखी थी। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों ने राहत की सांस ली।
शिकारी से रक्षक बनने का वो टर्निंग पॉइंट
जिंदगी के एक पड़ाव पर आकर कॉर्बेट की सोच पूरी तरह बदल गई। उन्हें यह अहसास हुआ कि कोई भी बाघ अपनी मर्जी से आदमखोर नहीं बनता। जब वे बूढ़े हो जाते हैं, किसी वजह से घायल होते हैं या उन्हें जंगल में अपना असली शिकार नहीं मिलता, सिर्फ तभी वे इंसानों की तरफ रुख करते हैं। इस सच्चाई ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने हमेशा के लिए शिकार करना छोड़ दिया, अपनी बंदूक रख दी और बाघों व अन्य वन्यजीवों की तस्वीरें दुनिया तक पहुंचाने के लिए हाथ में कैमरा थाम लिया।
देश का पहला नेशनल पार्क और कॉर्बेट का विजन
भारत में वन्यजीव संरक्षण को कानूनी रूप देने में जिम कॉर्बेट का बहुत बड़ा हाथ है। साल 1936 में बने देश के पहले नेशनल पार्क, ‘हेली नेशनल पार्क’, के निर्माण में उन्होंने मुख्य सलाहकार की जिम्मेदारी निभाई। अपनी भौगोलिक समझ के दम पर उन्होंने पार्क की सीमाएं तय कीं। साथ ही, उन्होंने तत्कालीन गवर्नर मैल्कम हेली और स्थानीय प्रशासन को शिकार पर पूरी तरह रोक लगाने और जानवरों को बचाने के लिए कड़े नियम बनाने के लिए प्रेरित किया।
किताबों में पिरोया भारतीय जंगलों का जादू
एक बेहतरीन लेखक के तौर पर जिम कॉर्बेट ने अपने रोमांचक अनुभवों को दुनिया के साथ बांटा। उनकी लिखी किताबें आज भी बहुत चाव से पढ़ी जाती हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
- मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं
- द टेंपल टाइगर
- जंगल लोर
इन्हीं किताबों ने दुनिया को पहली बार भारतीय जंगलों और वन्यजीवों की असल खूबसूरती से रूबरू कराया था।
भारत से विदाई और आखिरी सांसें
देश आजाद होने के बाद, साल 1947 में जिम कॉर्बेट केन्या जाकर बस गए। हालांकि, भारत छोड़ते समय उनका दिल बहुत भारी था और उन्होंने यहां के पहाड़ों, जंगलों और लोगों के लिए अपना गहरा लगाव व्यक्त किया था। 1952 में उनकी आखिरी किताब ‘ट्री टॉप्स’ प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने अफ्रीका के जंगलों से जुड़े अपने अनुभव और प्रकृति के प्रति अपना प्रेम साझा किया था।
वन्यजीवों को बचाने की दिशा में उनके इस निस्वार्थ योगदान का ही नतीजा है कि भारत के पहले नेशनल पार्क का नाम बदलकर ‘जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान’ कर दिया गया, जो आज भी वन्यजीव संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है।









