कोरबा की बेटी डॉ शेफाली चतुर्वेदी ने ऊर्जानगरी को किया गौरान्वित
कोरबा@M4S:कोरबा की धरती…जहाँ हवा में कोयले की महक थी और आसमान में टर्बाइन की गुनगुनाहट। यही वो जमीन थी, जहाँ एक नन्ही बच्ची पहली बार ‘आवाजों को महसूस करना सीख रही थी। वो सब तरफ चिमनियां देखती, शिफ्ट चेंज सायरन की आवाज़ें सुनती, वो कोरबा में रिहंद, विंध्याचल, रामागुंडम, तालचर, ऊंचाहार, बदरपुर, दादरी प्लांट्स और टाउनशिप के किस्से और सुनती पहाड़ी कोरवा को लेकर प्रशासन की जद्दोजहद। देखती छत्तीसगढ़ी ग्रामीण महिलाओं की मेहनत और हिम्मत।वह बच्ची सुनती थी मज़दूर औरतों की थकी हुई मगर उम्मीद भरी बातें,?स्कूल के शिक्षकों की कविताएँ और कभी-कभी दूर पहाड़ियों से आती जनजातीय की थाप। उसी संगीत में उसने सीखा हर आवाज़ एक कहानी कहती है। एनटीपीसी की टाउनशिप उनके लिए सिर्फ घर नहीं,?एक जीवंत विद्यालय थी, जहाँ हर गलियारा, हर चेहरा, एक नया पाठ था।जब वह वाद-विवाद में जीततीं, पूरी कॉलोनी झूम उठती। जब हारतीं, तो वही लोग कहानियों की तरह उन्हें सहारा देते। पिता सिखाते सहयोग बोलने से नहीं, करने से दिखता है। माँ समझातीं शिक्षा तब फलती है जब उसमें सहानुभूति की मिट्टी हो और छोटा भाई अनुपम उनका पहला दर्शक, साथी और प्रेरणा स्रोत बना।
घर की डाइनिंग टेबल पर जीत और हार दोनों का जश्न होता। वहीं शेफाली ने जाना कि संवाद ही नेतृत्व का मूल है सुनना, समझना और फिर दिशा देना। समय गुज़रा और वो बच्ची जो कभी पावर प्लांट के सायरनों और टाउनशिप के बीच कहानियाँ सुनती थी, अब दुनिया के कोनों में लोगों की आवाज़ें ढूँढ रही है और उन्हें सुरक्षित मंच दे रही है।बच्ची बड़ी हो चुकी है, अपने पांवों पर न सिर्फ खड़ी है, बल्कि दक्षिण एशिया में ह्यूमैनिटेरिअन इमरजेंसी कम्युनिकेशन के क्षेत्र में पारंगत लोगों में गिनी जाती है।
आज वो सिर्फ एक ब्रॉडकास्टर या स्टोरीटेलर न होकर, एक संवाद सेतु है जो लोगों, संस्कृतियों और देशों को जोड़ती है। अक्सर आप उसे कहते सुनेंगे – ‘अत्रावेर्सियामो — यानी, चलो, पार करें और सचमुच,?उसने पार कर लिया। सीमाएँ, भाषाएँ, और चुप्पियाँ भी।कोरबा से दुनिया तक,?उसने मौन को स्वर दिया है। चुलबुली पर गंभीर चटख पर संवेदनशील, विज्ञानप्रेमी पर कला की मुरीद इस लड़की को हम डॉक्टर शेफाली चतुर्वेदी के नाम से जानते हैं। मीडिया की दुनिया में उनका कदम स्वाभाविक था। माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से जनसंचार की पढ़ाई के बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में काम शुरू किया। उस समय रेडियो फिर से लोगों तक पहुंचने की कोशिश में था और शेफाली उसकी नई आवाज़ बनीं। उन्होंने सौ से ज़्यादा रेडियो जॉकी तैयार किए, पचास से अधिक सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की स्थापना में मदद की और रेडियो को आंदोलन बना दिया। उनका विश्वास था कहानियों को सुना जाने के लिए शोर नहीं, सच्चाई चाहिए। यही दृष्टि उन्हें एक संवेदनशील नेता बनाती है, जो अभिव्यक्ति में ईमानदारी को सबसे ऊपर रखती हैं। धीरे-धीरे उनका काम सीमाओं से परे पहुंचा। बिहार, असम, राजस्थान, केरल, फिर बांग्लादेश, इंडोनेशिया और श्रीलंका तक उनका सफर फैला। विश्व स्वास्थ्य संगठन में उन्होंने रोहिंग्या संकट के दौरान कॉक्स बाज़ार में स्वास्थ्य संचार केंद्र का नेतृत्व किया। अनिश्चितता के बीच उन्होंने दिखाया कि सच्चा नेतृत्व डर नहीं फैलाता, भरोसा बनाता है। उनके लिए सूचना केवल प्रचार नहीं, उपचार थी। उनके सहयोग के धागे दुनिया भर में फैले यूनिसेफ, बीबीसी मीडिया एक्शन, गर्ल राइजिंग, गिविंग ट्यूज़डे, पीरामल हेल्थ, झपिगो जैसे संगठनों के साथ उन्होंने मोबाइल अकादमी और किलकारी जैसे कार्यक्रम बनाए, जो लाखों माताओं तक पहुंचे। चुनाव आयोग के लिए रेडियो मंच तैयार किए, जेलों और गांवों में संवाद की नई भाषा गढ़ी। उनके लिए हर जगह, चाहे गांव की महिलाएं हों या जेल के कैदी, संवाद ही सशक्तिकरण का रास्ता था। शेफाली ने सिर्फ संचार नहीं सिखाया, बल्कि समानता आधारित नेतृत्व की राह दिखाई। जेंडर ट्रांसफॉर्मेशन ट्रेनर के रूप में वह संगठनों को सिखाती हैं कि समानता कोई नीति नहीं, दृष्टिकोण है। उनके सत्र डेटा और संवेदना को जोड़ते में सफल रहे। यह याद दिलाते हुए कि लिंग का मुद्दा आंकड़ों का नहीं, इंसानियत का है।
आज शेफाली की आवाज़ मंत्रालयों और एनजीओ के गलियारों में गूंजती है, पर उनके कदम अब भी ज़मीन पर टिके हैं। वो उतनी ही सहज हैं जब बिहार के गांवों में किशोरियों के साथ बैठकर चाय पीती हैं, जितनी जब डब्ल्यूएचओ के बोर्डरूम में स्वास्थ्य नीतियों पर बात करती हैं। यही उनकी लीडरशिप की असली पहचान है। जड़ों से जुड़कर भी वैश्विक सोच रखना। लाडली मीडिया अवार्ड, वुमन ऑफ सब्सटेंस, बेस्ट स्टोरीटेलर ये सब सम्मान उनके लिए सामूहिक जीत हैं। हर पुरस्कार में वो अपने शिक्षकों, माता-पिता, भाई और उस टाउनशिप का हिस्सा देखती हैं जिसने उनमें भरोसा जगाया।
कोरबा लौटती हैं, तो गूंजती है हमारी शेफाली ने कर दिखाया
जब वो कोरबा लौटती हैं, तो अब भी वही आवाज़ें गूंजती हैं ‘हमारी शेफाली ने कर दिखाया। वही सामूहिक भावना जिसने उनके बचपन को गढ़ा, आज भी उनके हर कदम में साथ चलती है। उसके संघर्ष की कहानी का यही सार है कि असली नेतृत्व वही है जो सुनने से शुरू होता है और दूसरों को अपनी आवाज़ खोजने में मदद करता है। अभी हाल ही में शेफाली को डॉक्टर की मानद उपाधि से सम्मनित किया गया है और उसके परिचितों ने अब उसे डॉक्टर शेफाली कहना शुरू का दिया है। अब भी आप पूछ कर देखिए कि अब आगे क्या ? जवाब मिलेगा , कोरबा से दिल्ली और दिल्ली से आगे का कभी नहीं सोचा पर पार किया। ये सीमित से असीमित होने की यात्रा है जो चलती रहेगी। आगे भी कुछ नया करेंगे, जो होगा जैसा होगा, मुस्कुराकर कहेंगे अत्रावेर्सियामो चलो पार करें।





































