कॉपी-किताब में जरूर होता है खाली मार्जिन, मगर क्यों? वजह जानकर कहेंगे- ‘अरे, ये तो कभी सोचा ही नहीं’

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नई दिल्ली(एजेंसी):हम सभी ने अपनी स्कूल की कॉपियों और किताबों के किनारे पर लाल या नीली लाइन वाला वो खाली हिस्सा जरूर देखा है, जिसे हम ‘मार्जिन’ कहते हैं। बचपन में कई बार हम सोचते थे कि आखिर कागज का इतना बड़ा हिस्सा खाली छोड़कर क्यों बर्बाद किया जाता है?

क्या यह सिर्फ पन्नों को सुंदर दिखाने के लिए है या फिर इसका मकसद सिर्फ टीचर्स के लाल पेन से नंबर देने के लिए जगह छोड़ना है? हम में से ज्यादातर लोग बचपन से यही मानते आए हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इसके पीछे की असली वजह यह बिल्कुल नहीं है, बल्कि सच्चाई बहुत ही रोचक और हैरान करने वाली है।

चूहों और कीड़े-मकोड़ों का खौफ

दरअसल, कॉपियों में मार्जिन छोड़ने की यह परंपरा कोई नई नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत कई दशकों पहले हुई थी। आपको यह जानकर हंसी भी आ सकती है कि इसका सीधा कनेक्शन चूहों, दीमक और कीड़े-मकोड़ों से है। जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना। पुराने जमाने में आज की तरह सुरक्षित लोहे की अलमारियां, कंप्यूटर, क्लाउड स्टोरेज या डिजिटल डेटा नहीं हुआ करता था। तब कागजों और अहम दस्तावेजों को सालों-साल सुरक्षित रखना एक बहुत बड़ी चुनौती होती थी। चूहों और दीमक की एक आम आदत होती है कि वे किसी भी कागज या किताब को हमेशा किनारों से ही कुतरना शुरू करते हैं।

जानकारी बचाने का अनोखा ‘सुरक्षा कवच’

अब जरा सोचिए, अगर किसी जरूरी कागज पर बिल्कुल किनारे से लेकर किनारे तक लिखा हो, तो क्या होगा? ऐसे में चूहे पन्नों के साथ-साथ उसमें लिखी गई बेहद महत्वपूर्ण जानकारी भी हमेशा के लिए नष्ट कर देते। इसी बड़ी परेशानी से बचने के लिए उस दौर के लोगों ने एक गजब का दिमाग लगाया।

उन्होंने पन्नों को बचाने के लिए कागज के किनारों पर खाली जगह यानी ‘मार्जिन’ छोड़ने का फैसला किया। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अगर चूहे या कीड़े कागज को किनारों से थोड़ा कुतर भी लें, तो भी बीच में लिखा हुआ जरूरी डेटा एकदम सुरक्षित रहता था। यह खाली जगह एक तरह से शब्दों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ का काम करती थी।

पन्नों के फटने और ‘बाइंडिंग’ की समस्या का हल

सिर्फ चूहे ही नहीं, बल्कि वक्त के साथ पन्नों के खराब होने की समस्या भी एक बड़ा कारण थी। हम सभी जानते हैं कि लंबे समय तक इस्तेमाल करने से पन्ने किनारों से घिसकर फटने लगते हैं या नमी की वजह से गलने लगते हैं।

इसके अलावा, जब कई पन्नों को मिलाकर एक मोटी किताब या डायरी बांधी जाती है, तो कागज के किनारों का काफी हिस्सा अंदर की तरफ दब जाता है। अगर मार्जिन न हो, तो हमारे लिखे हुए शब्द बाइंडिंग में छिप जाएंगे और उन्हें पढ़ना नामुमकिन हो जाएगा। इसलिए मार्जिन ने इन सभी समस्याओं को बड़ी आसानी से सुलझा दिया और पढ़ने का अनुभव बेहतर कर दिया।

आज के समय में मार्जिन का असली फायदा

आजकल भले ही हमारे घरों और ऑफिस में चूहे किताबें न कुतरते हों, लेकिन मार्जिन छोड़ने की यह पुरानी तरकीब अब हमारी आदत और किताबों की छपाई का अहम हिस्सा बन चुकी है। आज के समय में यह खाली जगह हमारे बहुत काम आती है। इसी जगह पर हम एक्स्ट्रा नोट्स लिखते हैं, बुलेट पॉइंट्स डालते हैं और हमारे टीचर्स इसी जगह का इस्तेमाल हमें नंबर देने या अपनी टिप्पणी लिखने के लिए करते हैं। इसके अलावा, मार्जिन की वजह से हमारी लिखावट बहुत साफ, व्यवस्थित और सुंदर भी दिखती है।

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