आंखें न मिलना या कम बोलना हो सकते हैं ऑटिज्म के संकेत, बच्चों में इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

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नई दिल्ली।(एजेंसी):ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक विकासात्मक स्थिति है, जो दिमाग के विकास में बदलाव की वजह से होती है। इसका प्रभाव बच्चों के बात-चीत करने और दूसरों के साथ मेल-जोल करने के तरीके पर पड़ता है। माता-पिता के रूप में, यह समझना जरूरी है कि ऑटिज्म के लक्षण हर बच्चे में अलग हो सकते हैं।

कुछ बच्चों में इसके लक्षण बहुत शुरुआती उम्र में दिखने लगते हैं, जबकि कुछ में स्कूल जाने की उम्र तक साफ नहीं होते। समय पर इसकी पहचान करना बच्चे के बेहतर भविष्य और विकास के लिए बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं कि अलग-अलग उम्र के बच्चों में ऑटिज्म के मुख्य संकेत क्या हैं।

छोटे बच्चों में शुरुआती संकेत

शिशुओं और टॉडलर्स में ऑटिज्म के लक्षण अक्सर उनकी सामाजिक प्रतिक्रियाओं से जुड़े होते हैं, जैसे-

  • नाम पर प्रतिक्रिया न देना- आमतौर पर बच्चे अपना नाम पुकारने पर मुड़कर देखते हैं, लेकिन ऑटिस्टिक बच्चे अक्सर इसे अनसुना कर देते हैं।
  • आंखें न मिलाना- बात करते समय या खेलते समय आंखों में आंखें डालकर न देखना एक अहम संकेत है।
  • कम मुस्कुराना- अगर आप बच्चे को देखकर मुस्कुराते हैं और वह बदले में कोई रिएक्शन या मुस्कान नहीं देता, तो यह चिंता का विषय हो सकता है।
  • सेंसरी सेंसिटिविटी- किसी खास आवाज, गंध या स्वाद से बहुत ज्यादा परेशान हो जाना या रोने लगना।
  • हरकतें दोहराना- अपने हाथों को फड़फड़ाना, उंगलियां चटकाना या शरीर को बार-बार आगे-पीछे झुलाना।
  • बहुत कम बोलना- अपनी उम्र के अन्य बच्चों की तुलना में कम बोलना या बिल्कुल न बोलना।
  • काल्पनिक खेल की कमी- रोलप्ले वाले खेल, जैसे गुड़िया, किचन सेट आदि में कोई रुचि न दिखाना।
बड़े बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण

जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, चुनौतियां सामाजिक व्यवहार और बात-चीत में ज्यादा साफ होने लगती हैं-

  • भावनाओं को समझने में परेशानी- दूसरों के हाव-भाव या वे क्या महसूस कर रहे हैं, इसे समझने में उन्हें मुश्किल होती है।
  • बातचीत का अलग तरीका- अपनी पसंद के विषयों पर लगातार बोलते रहना, लेकिन दूसरों की बात न सुनना या एक ही वाक्य को बार-बार दोहराना।
  • फिक्स रुटीन- इन्हें एक फिक्स रूटीन पसंद होता है। अगर दिनचर्या में जरा-सा भी बदलाव हो, तो ये बहुत परेशान या गुस्सा हो सकते हैं।
  • गहरी रुचि- किसी एक खास विषय, खिलौने या एक्टिविटी में बहुत ज्यादा डूबे रहना।
  • सामाजिक अलगाव- दोस्त बनाने में परेशानी या अकेले रहना ज्यादा पसंद करना।
  • कमजोर कम्युनिकेशन स्किल्स- ये मुहावरों या व्यंग्य को नहीं समझ पाते, जैसे- अगर कोई कहे पेट में चूहे कूद रहे हैं, तो वे इसे सच मान सकते हैं।

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