मछुवारा समितियों ने ठेकेदार से कोई भी अनुबंध नहीं करने का लिया निर्णय

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 ठेकेदार और मत्स्य महासंघ के स्थानीय 22 पंजीकृत मछुवारा समितियों की हुई बैठक
कोरबा@M4S:मत्स्य महासंघ छत्तीसगढ़ द्वारा बागों बांध जलाशय को पुन: ठेके पर देने का विरोध किया जा रहा है। ठेकेदार से कोई भी अनुबंध नहीं करने का हसदेव बागों जलाशय के 22 पंजीकृत मछुवारा समितियों ने निर्णय लिया है।
सोमवार को वर्तमान में मिनीमाता हसदेव बांगो जलाशय को ठेके पर लिए हुए ठेकेदार छत्रपाल पटेल रायपुर तथा मत्स्य महासंघ ने स्थानीय 22 पंजीकृत मछुवारा समितियों के साथ सामूहिक बैठक आयोजित की गई। बैठक में समितियों ने कहा कि स्थानीय मछुआरा समुदाय, जलाशय विस्थापित आदिवासी समाज जिनके 58 गांव बांध के कारण पूर्णत: डूब गए थे। लंबे समय से सरकार की मत्स्य नीति का विरोध कर रहे है, जो कि जलाशय को 10 वर्षों की लीज पर दे देता है। बैठक वर्तमान में ठेकदार छत्रपाल पटेल और मत्स्य विभाग द्वारा संयुक्त रुप से आयोजित की गई थी, जिसमें जलाशय की सभी 22 पंजीकृत मछुआरा समितियों से ठेकदार मछली के मूल्य पर अनुबंध करना चाहता था कि समितियां उस मूल्य पर मछली पकड़ कर ठेकदार को देगी। बैठक का सभी 22 समितियों के पदाधिकारी और स्थानीय विस्थापित आदिवासियों ने कड़ा विरोध किया। छातापखना मछुआरा समिति के अध्यक्ष दीपक मंझवार ने बताया कि मत्स्य नीति का हम लंबे समय से विरोध कर रहें रहे है और इसी वर्ष 10 वर्षों का ठेका जून माह के पूरा हो रहा था। इसलिए हमने शासन, अधिकारियों को इससे अवगत कराया कि ठेका प्रणाली हम स्थानीय का शोषण करती है। मत्स्य नीति में बदलाव करके बांध के मत्स्यखेट की रॉयल्टी आधारित पुरानी प्रणाली पुन: लागू की जाए। हमारी किसी समिति ने ठेका में भाग नहीं लिया, किंतु विस्थापितों की समस्याओं को अनसुना कर मत्स्य महासंघ ने ठेका जारी कर 51 लाख में मिनीमाता हसदेव बांध को नीलम कर दिया। नारी शक्ति मछुआरा समिति बुका के फिरतु बिंझवार ने बताया कि पिछला ठेकेदार हमसे औने पौने दामों पर मछलियां खरीदता था। ऊपर से मना करने पर मारपीट, पुलिस की धमकी आम बात थी। इसी के साथ नियम में यह लिखा है कि हर साल ठेकदार को बांध में प्रति वर्ष मछली बीज डालना होता हैं, किंतु पिछला ठेकदार ने 10 वर्षों में केवल एक बार मछली बीज डाला था। यह मत्स्य विभाग और ठेकेदार की मिलीभगत और भ्रष्टाचार का साफ नमूना है।साथ ही पानी में मछलियों के निर्मम दोहन से बांध के जल के पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर असर पड़ा हैं। यह मुद्दा आदिवासियों, विस्थापितों के संवैधानिक और आर्थिक अधिकारों और न्याय के साथ पर्यावरण और उसके जीवों का भी हैं। अंत में सभी समितियों तथा आदिवासियों ने ठेकेदार के लिए काम करने से मना कर दिया और यह निर्णय लिया कि हम अपने ही जल जंगल जमीन पर ठेकेदारों के नौकर नहीं बनेंगे साथ ही पानी, उसकी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने का भी संकल्प लिया।

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