नई दिल्ली(एजेंसी):सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के कामकाज पर कड़ी निगरानी का सिस्टम लागू किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक नए चुनाव के जरिए इसका पुनर्गठन नहीं हो जाता, तब तक वकीलों की इस शीर्ष संस्था के हर नीतिगत फैसले में भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) को सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने साफ किया कि बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा का पद पर बने रहना 2030 तक की व्यवस्था नहीं माना जा सकता। बेंच ने कहा कि पहली नजर में उनका पद केवल प्रो टेम (अस्थायी) है, जो तब तक रहेगा जब तक कि बीसीआई अपने पदाधिकारी नहीं चुन लेती।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश क्यों महत्वपूर्ण है?
कोर्ट का दखल तब हुआ जब राज्य बार काउंसिल के चुनावों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी। इन याचिकाओं में बीसीआई चेयरमैन के तौर पर मिश्रा के बने रहने और चेयरमैन व वाइस-चेयरमैन का कार्यकाल 2030 तक बढ़ाने वाले नोटिफिकेशन्स की वैधता को चुनौती दी गई थी।
नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 में ग्रेजुएट होने वाले बैच के मामले में बीसीआई के दखल की आलोचना करने के कुछ ही दिनों बाद बेंच के ये निर्देश अहम हो जाते हैं। बीसीआई चेयरमैन मिश्रा ने पहले राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे उन छात्रों का एनरोलमेंट न करें जिन्होंने दीक्षांत समारोह में सीजेआई को बुलाने का विरोध किया था। बाद में उन्होंने यह रोक हटा ली और आखिरकार उस बैच के खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी।
मंगलवार को बेंच ने कहा कि उसकी तुरंत चिंता किसी व्यक्ति का व्यवहार नहीं, बल्कि बीसीआई का संस्थागत कामकाज और कोर्ट के निर्देशों के तहत राज्य बार काउंसिल के चुनाव होने के बाद कानूनी चुनावी व्यवस्था को फिर से बहाल करने की जरूरत थी।
कोर्ट के सामने विवाद 2025 में जारी बीसीआई के उन नोटिफिकेशन को लेकर था, जिनके तहत मिश्रा और वाइस-चेयरपर्सन एस. प्रभाकरन को पांच साल का कार्यकाल देने की बात कही गई थी। जबकि बीसीआई नियमों के नियम 12(2) में चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए दो साल के कार्यकाल का प्रावधान है।
याचिकाकर्ताओं की वकील ने क्या कहा?
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुईं सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने बेंच को बताया कि मिश्रा को 2 मार्च, 2025 को सर्वसम्मति से चेयरमैन चुना गया था। उनका कार्यकाल 17 अप्रैल, 2025 से शुरू होकर 16 अप्रैल, 2030 तक का था। उन्होंने बताया कि 9 जनवरी, 2025 के एक प्रस्ताव के जरिए चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन का कार्यकाल तीन साल से बढ़ाकर पांच साल करने की कोशिश की गई थी, जबकि नियमों के मुताबिक यह कार्यकाल सिर्फ दो साल का ही होता है।
इस पर बेंच ने सवाल उठाया कि जब नियमों में दो साल के कार्यकाल का प्रावधान है तो इस तरह का विस्तार कैसे लागू हो सकता है। बेंच ने कहा, “दिलचस्प बात यह है कि इसमें कार्यकाल को तीन साल से बढ़ाकर पांच साल करने की बात कही गई है, जबकि नियमों में केवल दो साल का प्रावधान है।”
दीवान ने एडवोकेट्स एक्ट की धारा 4(3) के उस प्रावधान पर सवाल उठाया, जिसके तहत बीसीआई सदस्य तब तक अपने पद पर बने रह सकते हैं जब तक कि उनके उत्तराधिकारी चुन न लिए जाएं। उन्होंने तर्क दिया कि प्रशासनिक कामकाज में कोई रुकावट न आए इसके लिए बनाए गए इस प्रावधान का असल में इस्तेमाल चुनाव टालने और मौजूदा पदाधिकारियों को पद पर बनाए रखने के लिए किया गया।
बेंच ने कहा कि यह प्रावधान सिर्फ एक अंतरिम और अस्थायी व्यवस्था थी और अब जब स्टेट बार काउंसिल के चुनाव पूरे हो चुके हैं तो इससे जुड़ा विवाद शायद अब खत्म हो गया है। इसमें कहा गया कि सबसे अहम बात यह है कि अब नई चुनी हुई स्टेट बार काउंसिलों को बीसीआई के लिए अपने प्रतिनिधि चुनने के वास्ते एडवोकेट्स एक्ट की धारा 4(1)(c) के तहत अपनी कानूनी शक्तियों का इस्तेमाल करना होगा।
इसके बाद वे प्रतिनिधि बीसीआई के चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन को चुनेंगे। कोर्ट ने पूछा, “क्या इसमें कोई शक है कि मौजूदा पदाधिकारी 2030 तक अनिश्चित काल के लिए अपने पद पर बने नहीं रह सकते?”
कोर्ट ने बीसीआई में सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर जताई गई चिंताओं पर भी ध्यान दिया, जिसमें बीसीआई के मौजूदा और पूर्व पदाधिकारियों के नियंत्रण वाले ट्रस्ट बनाने और उनके कामकाज से जुड़े आरोप भी शामिल हैं।
सीनियर वकील गोपाल शंकरनारायणन ने 2020 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट फॉर प्रमोशन ऑफ एजुकेशन, लीगल एंड प्रोफेशनल रिफॉर्म्स एंड इम्प्रूवमेंट इन रिसर्च (PEARL Trust) के गठन का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इसके डीड में 11 मैनेजिंग ट्रस्टियों को बीसीआई सदस्य के तौर पर उनके कार्यकाल की परवाह किए बिना मूल और स्थायी ट्रस्टी बना दिया गया।
बेंच ने उठाया सवाल
बेंच ने सवाल उठाया कि क्या बीसीआई जैसी चुनी हुई कॉर्पोरेट संस्था अपनी संपत्ति का इस्तेमाल करके ऐसा ट्रस्ट बना सकती है, जिसमें कुछ खास लोग हमेशा के लिए ट्रस्टी बने रहें भले ही वे उस संस्था के सदस्य न रह जाएं जिसने ट्रस्ट बनाया था।
इसके बाद दीवान ने सुझाव दिया कि जब तक पुनर्गठन पूरा नहीं हो जाता, तब तक अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को काउंसिल के हर अहम फैसले में शामिल होना चाहिए। एजी और सीजी दोनों ही बीसीआई के पदेन सदस्य होते हैं।
कोर्ट ने साफ किया कि लॉ ऑफिसर्स को बीसीआई के रोजमर्रा के कामकाज का हिस्सा बनने की जरूरत नहीं है, लेकिन जब भी किसी ऐसे फैसले पर विचार किया जा रहा हो जिसके नीतिगत तौर पर अहम नतीजे हों तो उन्हें उसमें शामिल किया जाना चाहिए।
इसके बाद, नई बनी काउंसिलों के पास अपने चेयरमैन, वाइस-चेयरमैन और दूसरे पदाधिकारियों को चुनने के लिए दो हफ्ते का समय होगा। साथ ही, उन्हें एडवोकेट्स एक्ट के तहत बीसीआई में अपने प्रतिनिधि भी चुनने होंगे। अनुपालन रिपोर्ट मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट बीसीआई के पुनर्गठन के मामले पर विचार करेगा। इन मामलों की सुनवाई 23 सितंबर को होगी।





















































