दुनिया अजीब मोड़ पर खड़ी है।
एक तरफ नए कोयला बिजलीघर अब भी बन रहे हैं। दूसरी तरफ उन्हीं देशों में कोयले से बनने वाली बिजली घट रही है। यानी प्लांट बढ़ रहे हैं, लेकिन कोयला पहले जितना जल नहीं रहा।
यही तस्वीर सामने आई है Global Energy Monitor की नई रिपोर्ट Boom and Bust 2026 में। रिपोर्ट बताती है कि 2025 में दुनिया की कुल कोयला बिजली क्षमता 3.5 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन कोयले से पैदा हुई बिजली 0.6 प्रतिशत घट गई।
यह गिरावट सबसे ज्यादा चीन और भारत में दिखी। और यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।
क्योंकि दोनों देशों ने 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर नए कोयला प्लांट भी शुरू किए। लेकिन उसी दौरान इतनी तेजी से सोलर और विंड बिजली जुड़ी कि नई बिजली मांग का बड़ा हिस्सा साफ ऊर्जा से पूरा होने लगा।
रिपोर्ट के मुताबिक चीन में कोयला क्षमता 6 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन कोयले से बिजली उत्पादन 1.2 प्रतिशत घट गया। भारत में क्षमता 3.8 प्रतिशत बढ़ी, जबकि उत्पादन 2.9 प्रतिशत गिरा।
दिल्ली की गर्म दोपहरों में जब छतों पर लगे सोलर पैनल चमकते हैं, या राजस्थान की हवा से टर्बाइन घूमते हैं, तब यह बदलाव सिर्फ ग्राफ में नहीं दिखता। वह धीरे-धीरे बिजली व्यवस्था की आदतें बदल रहा है।
रिपोर्ट कहती है कि अब दुनिया के सिर्फ 32 देश नए कोयला प्लांट प्रस्तावित या निर्माण कर रहे हैं। 2014 में यह संख्या 75 थी।
यानी कोयले का भूगोल सिकुड़ रहा है। लैटिन अमेरिका ने 2025 में “नो न्यू कोल” स्थिति हासिल कर ली। दक्षिण कोरिया ने पूर्ण कोयला चरणबद्ध समाप्ति का संकल्प लिया। तुर्किये, जो जल्द COP31 जलवायु सम्मेलन की मेजबानी करेगा, वहां अब सिर्फ एक सक्रिय कोयला प्रस्ताव बचा है।
लेकिन इस पूरी कहानी में भारत का हिस्सा छोटा नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में 2025 के दौरान 27.9 गीगावॉट नए और पुनर्जीवित कोयला प्लांट प्रस्ताव सामने आए। देश में अभी 107.3 गीगावॉट क्षमता प्री-कंस्ट्रक्शन चरण में है और 23.5 गीगावॉट निर्माणाधीन है। सरकार अगले सात वर्षों में 100 गीगावॉट नई कोयला क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखती है।
लेकिन इसी दौरान एक दूसरी कहानी भी चल रही है।
भारत में 2025 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता कुल स्थापित बिजली क्षमता के आधे से ज्यादा हो गई। रिकॉर्ड स्तर पर सोलर और विंड बिजली जुड़ी।
यानी देश एक साथ दो दिशाओं में चल रहा है। एक तरफ भविष्य की साफ ऊर्जा। दूसरी तरफ पुराने भरोसे का कोयला।
Christine Shearer, जो Global Coal Plant Tracker की प्रोजेक्ट मैनेजर हैं, कहती हैं, “2025 में दुनिया ने ज्यादा कोयला प्लांट बनाए, लेकिन कम कोयला इस्तेमाल किया। अब चुनौती विकल्पों की कमी नहीं, बल्कि उन नीतियों की है जो अब भी कोयले को जरूरी मानती हैं, जबकि बिजली व्यवस्था उससे आगे बढ़ रही है।”
यह बदलाव सिर्फ पर्यावरण की बहस नहीं है। यह अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और आने वाले शहरों की कहानी भी है।
रिपोर्ट बताती है कि इंडोनेशिया में कोयला क्षमता 7 प्रतिशत बढ़ी, जिसका बड़ा हिस्सा निकल और एल्यूमिनियम प्रोसेसिंग के लिए “कैप्टिव कोल” से जुड़ा है। पाकिस्तान में वितरित सोलर तेजी से बढ़ा और उसने आयातित ईंधन के दबाव को कुछ हद तक कम किया। वहीं बांग्लादेश अब भी जीवाश्म ईंधन आपूर्ति संकट और तकनीकी चुनौतियों से जूझ रहा है।
रिपोर्ट एक और दिलचस्प बात कहती है।
2025 में जिन कोयला यूनिट्स को बंद होना था, उनमें से लगभग 70 प्रतिशत बंद ही नहीं हुईं। यूरोप और अमेरिका दोनों जगह कई पुराने प्लांट योजनाओं के बावजूद चलते रहे। यानी दुनिया अभी पूरी तरह कोयले से बाहर नहीं आई है। लेकिन पहली बार ऐसा दिख रहा है कि बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हर बार कोयले की जरूरत भी नहीं पड़ रही।
शायद यही इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी कहानी है। कोयले का युग खत्म नहीं हुआ। लेकिन उसकी अनिवार्यता दरकने लगी है।






