वकीलों की सर्वोच्च संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया क्या है और क्या होते हैं इसके अधिकार? यहां मिलेगा हर सवाल का जवाब

- Advertisement -

नई दिल्ली(एजेंसी):हैदराबाद की प्रतिष्ठित एनएएलएसएआर (NALSAR) यूनिवर्सिटी के आगामी दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के आमंत्रण को लेकर भड़का छात्रों का विरोध अब देश का सबसे बड़ा कानूनी और प्रशासनिक विवाद बन गया है।

इस वैचारिक मतभेद ने उस वक्त तूल पकड़ लिया जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने छात्रों के एक वर्ग द्वारा उठाए गए सवालों और विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर सीधे तौर पर उनके वकालत के नामांकन रोक लगाने का फरमान जारी कर दिया।

ऐसे में सीजेआई और छात्रों के बीच के मामले में BCI के इस कदम को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई। कई तरह के सवाल भी पूछे जा रहे हैं। एक तरफ जहां BCI इसे पेशेवर अनुशासन और संस्थागत गरिमा की रक्षा बता रही थी, वहीं दूसरी ओर इस मनमाने आदेश ने न्यायपालिका और विधिक बिरादरी के बीच एक तीखी बहस छेड़ दी।

अब सवाल है कि आखिर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) होता क्या है? इसका अधिकार क्या होता है? छात्रों के खिलाफ फरमान कैसे जारी किया गया? आइए हम आपको बताते हैं।

पहले समझिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) क्या है?

बार काउंसिल ऑफ इंडिया भारत में वकीलों और लीगल प्रोफेशन की शीर्ष नियामक संस्था है। इसकी संरचना और गठन मुख्य रूप से अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के तहत होता है।

बात अगर गठन की करें तो BCI के सदस्य सीधे तौर पर देश की अलग-अलग राज्य बार काउंसिलों द्वारा चुने जाते हैं। हर राज्य बार काउंसिल अपने सदस्यों में से प्रतिनिधियों को BCI के लिए चुनती है। इसके अलावा, भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल इसके पदेन सदस्य होते हैं। वहीं काउंसिल के सदस्य आपस में मिलकर अपने लिए एक चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन का चुनाव करते हैं।

ऐसे होता है अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव

जब BCI के सभी सदस्य चुनकर आ जाते हैं, तो ये सभी सदस्य मिलकर आपस में से ही बहुमत के आधार पर एक सदस्य को अध्यक्ष और एक अन्य सदस्य को उपाध्यक्ष के रूप में चुनते हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का यह कार्यकाल दो साल का होता है। दो साल पूरे होने के बाद दोबारा चुनाव या पुनर्चयन की प्रक्रिया होती है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के मुख्य कार्य क्या हैं?

BCI के पास व्यापक विधिक अधिकार हैं। प्रमुख तौर पर देखे तो इसके अधिकार क्षेत्र में कानूनी शिक्षा का मानक तय करना आता है। इस बात को ऐसे समझिए कि देश भर के लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का स्तर कैसा हो, पाठ्यक्रम में क्या शामिल हो, और लॉ डिग्रियों को मान्यता देना BCI का मुख्य काम है।

वकीलों का पंजीकरण भी BCI के अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है। यह राज्य बार काउंसिलों के कामकाज की निगरानी करता है और वकीलों के लिए अखिल भारतीय स्तर पर नियम बनाता है।

वकीलों के लिए नियम तय करने का भी अधिकार

आपको बता दें कि बार काउंसिल का काम व्यावसायिक नैतिकता तय करना भी होता है। खासकर वकीलों के लिए आचार संहिता और नियम तय करना, ताकि अदालतों में गरिमा बनी रहे।

दूसरी ओर बात अब अगर अनुशासनात्मक कार्रवाई की करें तो यदि कोई वकील अपने पेशे के नियमों का उल्लंघन करता है या दुराचार में लिप्त पाया जाता है, तो BCI के पास उसकी वकालत का लाइसेंस निलंबित या रद्द करने की अनुशासनात्मक शक्तियां होती हैं। इसके अलावा बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में वकीलों के कल्याण और सामाजिक सुरक्षा के लिए फंड और योजनाएं संचालित करना भी है।

भारत में सबसे पहले बार काउंसिल का गठन कब हुआ था?

यदि हम इसके ऐतिहासिक सफर की बात करें, तो ब्रिटिश काल में वकीलों के नियमन के लिए अलग-अलग हाई कोर्ट्स के अधीन व्यवस्थाएं थीं। एक एकीकृत और संगठित प्रणाली की मांग को देखते हुए सबसे पहले भारतीय बार काउंसिल अधिनियम, 1926 पारित किया गया था।

इसके बाद देश की आजादी के बाद कानूनी सुधारों और एक मजबूत व्यवस्था के लिए एस.आर. दास समिति (ऑल इंडिया बार कमिटी, 1951) की सिफारिशों के आधार पर संसद ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 पास किया। इसी 1961 के अधिनियम के तहत औपचारिक रूप से आधुनिक बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का गठन किया गया था।

अभी अचानक चर्चा में क्यों आया है BCI?

हाल ही में BCI के चर्चा में आने की मुख्य वजह हैदराबाद की प्रतिष्ठित एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (NALSAR) के छात्रों और प्रशासन के बीच हुआ विवाद है।

दीक्षांत समारोह और सीजेआई का विरोध

हुआ यूं कि एनएएलएसएआर के आगामी दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को आमंत्रित किया गया था। यूनिवर्सिटी के छात्रों के एक वर्ग ने इस आमंत्रण का विरोध करते हुए एक खुला पत्र लिखा।

छात्रों का तर्क था कि हाल ही में जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ज्यादतियों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की कुछ कार्यवाहियों और रुख को लेकर उनकी असहमति है, इसलिए संस्था को ऐसे समय में अतिथि चयन को लेकर संवेदनशील होना चाहिए। छात्रों के इस विरोध और पत्र के बाद यह मामला तूल पकड़ गया।

NALSAR विवाद में BCI की क्या भूमिका रही और क्यों रही?

इस बात को ऐसे समझिए कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान BCI ने एक आक्रामक कदम उठाते हुए शुरुआती दौर में बेहद सख्त रुख अपनाया। BCI ने एक सर्कुलर जारी कर सभी राज्य बार काउंसिलों को यह निर्देश दे दिया कि वे एनएएलएसएआर के 2026 बैच के पास आउट होने वाले किसी भी छात्र का वकील के रूप में नामांकन तब तक रोक कर रखें जब तक कि अगला आदेश नहीं आ जाता।

BCI ने यूनिवर्सिटी प्रशासन से उन छात्रों या बाहरी तत्वों की पहचान कर रिपोर्ट मांगी जो इस विरोध प्रदर्शन या अभियान के पीछे थे। मामले में काउंसिल का तर्क था कि इस तरह के अभियानों से न्यायिक संस्थाओं की गरिमा और अनुशासन पर असर पड़ता है, इसलिए इसे पेशेवर अनुशासनहीनता के दायरे में देखा जाना चाहिए।

हालांकि, तीखी आलोचना और चौतरफा विरोध के बाद BCI ने अपने इस आदेश को कुछ ही घंटों में संशोधित कर दिया और बाद में कार्यवाही पूरी तरह बंद करने की घोषणा कर दी।

Related Articles