लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
रात का सन्नाटा था, लेकिन धमतरी की सड़कों पर गाड़ियों की लाइटें किसी अशुभ घटना का संकेत दे रही थीं। पुलिस की गाड़ी में बैठे तीन युवक—चेहरे पर नशे की चमक और बेखौफ मुस्कान—मानो दुनिया को यह जताने आए हों कि अपराध उनके लिए कोई डर का विषय नहीं है। इनकी आंखों में डर की जगह एक अजीब-सा गुरूर था, जैसे किसी फिल्म का खलनायक अपनी जीत का जश्न मना रहा हो। लेकिन यह फिल्म नहीं थी, यह हमारे समाज की कड़वी सच्चाई थी, जिसमें तीन निर्दोष युवकों की हत्या हुई थी। छत्तीसगढ़, जो अपनी शांत संस्कृति, लोकगीतों, लोकनृत्यों और सरल जीवनशैली के लिए जाना जाता था, अब धीरे-धीरे एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ नशे की गिरफ्त हर मोहल्ले, हर गली में फैलती जा रही है। शराब, सूखा नशा, ड्रग्स, गांजा, पाउडर- नाम बदलते हैं, लेकिन असर एक ही होता है- जिंदगी की बर्बादी और समाज का पतन।

इन युवकों की गिरफ्तारी की तस्वीर देखकर कोई भी सोच में पड़ जाएगा कि आखिर ये लोग इस हालत में कैसे पहुंचे? आंखें लाल, शरीर पर चोट के निशान, और चेहरे पर वह हंसी जो बेफिक्री से ज्यादा बर्बरता का संकेत देती है। यह केवल कानून और अपराध की कहानी नहीं है, यह एक चेतावनी है कि नशा केवल व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे समाज को खोखला कर देता है। आज से 20-25 साल पहले छत्तीसगढ़ के गाँव और कस्बों में नशे का इतना गहरा असर नहीं था। लोग शाम को चौपाल में बैठते थे, गीत गाते थे, ताश खेलते थे, लेकिन अपराध की घटनाएँ दुर्लभ थीं। अब हालात बदल चुके हैं। दारू की भट्टियाँ हर शहर और गाँव के कोने-कोने में हैं, और उनसे भी ज्यादा खतरनाक है अवैध नशे का व्यापार, जो युवाओं को सीधे अपराध की दुनिया में धकेल देता है। इन तीनों युवकों की कहानी शायद एक जैसी ही होगी- किसी ने दोस्तों के दबाव में आकर नशा शुरू किया होगा, किसी ने बेरोजगारी और निराशा से भागने के लिए, और किसी ने केवल ‘स्टाइल’ में दिखने के लिए। लेकिन नशे का रास्ता सीधा अंधकार की ओर ले जाता है। पहले जेब खाली होती है, फिर घर के सामान बिकते हैं, और जब नशे की भूख पूरी नहीं होती तो अपराध की ओर कदम बढ़ जाते हैं। धमतरी में हुई यह हत्या केवल एक पुलिस केस नहीं है, यह उस बीमारी का लक्षण है जो पूरे समाज को जकड़ चुकी है। अपराधियों के चेहरों पर डर का न होना इस बात का संकेत है कि कानून का भय भी उनके मन से मिट चुका है। यह स्थिति तब बनती है जब अपराधियों को पता होता है कि सजा मिलने में सालों लगेंगे, या फिर वे किसी न किसी तरह बच निकलेंगे। इस तस्वीर को देखकर मन में एक और सवाल उठता है—इन युवाओं के माता-पिता कहाँ थे? परिवार ने कब महसूस किया कि उनका बेटा नशे में डूब रहा है? क्या उन्होंने समय रहते रोकने की कोशिश की, या फिर समाज के डर से चुप रहे? सच यह है कि नशे की समस्या से लड़ने में सबसे बड़ी भूमिका परिवार की होती है। लेकिन हमारे यहाँ अक्सर माता-पिता तब तक चुप रहते हैं जब तक कोई बड़ी घटना न हो जाए। समाज में भी एक अजीब-सा विरोधाभास है। एक तरफ हम नशामुक्ति अभियान चलाते हैं, स्कूल-कॉलेज में जागरूकता कार्यक्रम करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ शादियों, पार्टियों और यहाँ तक कि सार्वजनिक मेलों में भी शराब और नशा आम हो चुका है। बच्चों और युवाओं को हम क्या संदेश दे रहे हैं? कि नशा केवल तभी बुरा है जब वह गरीब करता है, लेकिन अगर वह ‘स्टेटस सिंबल’ के रूप में है तो ठीक है? इन तीन युवकों के चेहरे देखकर यह भी समझ आता है कि नशा व्यक्ति के भीतर की इंसानियत को खत्म कर देता है। हत्या जैसे जघन्य अपराध करने के बाद भी उनमें कोई पछतावा नहीं दिखता। उनकी आँखें, उनकी हरकतें बताती हैं कि वे नशे के ऐसे स्तर पर पहुँच चुके हैं जहाँ सही और गलत का फर्क ही मिट चुका है। हमारे समाज को अब यह तय करना होगा कि हम इस समस्या को केवल पुलिस और कानून के भरोसे छोड़ देंगे, या खुद भी जिम्मेदारी लेंगे। नशे के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई घर और मोहल्ले से शुरू होती है। अगर किसी का बेटा, भाई, दोस्त या पड़ोसी गलत राह पर जा रहा है, तो हमें बोलना होगा, टोकना होगा। चुप रहना भी एक तरह से अपराध में भागीदार बनना है। सरकार को भी यह समझना होगा कि केवल कानून बनाना या कार्रवाई करना काफी नहीं है। नशे के अवैध धंधे को जड़ से खत्म करने के लिए शिक्षा, रोजगार और मानसिक स्वास्थ्य पर भी काम करना होगा। बेरोजगार, निराश और अकेला युवा नशे का सबसे आसान शिकार बनता है। अगर हम उसे सही दिशा और अवसर देंगे, तो वह गलत रास्ते पर नहीं जाएगा।धमतरी की यह घटना हमें झकझोरने के लिए काफी है। आज ये तीन युवक किसी और की हत्या के आरोपी हैं, कल न जाने हमारे अपने घर के सामने भी ऐसे ही दृश्य देखने को मिल सकते हैं, अगर हम अभी नहीं जागे तो। नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसकी पूरी पीढ़ी को बर्बाद कर देता है। यह परिवार की खुशियाँ, समाज की शांति और देश का भविष्य सब छीन लेता है। हमें यह समझना होगा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है- यह हम सबकी लड़ाई है। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि अपने घर, अपने मोहल्ले और अपने शहर को नशामुक्त बनाने के लिए कदम उठाएँगे। नशे की भट्टी पर जयकारा नहीं, बल्कि ताला लगेगा। शराब, सूखा नशा, ड्रग्स, गांजा और पाउडर—इन सबका छत्तीसगढ़ में कोई स्थान नहीं होगा। तभी हम वह छत्तीसगढ़ बना पाएँगे, जिसकी पहचान उसके गीत, संस्कृति और मेहनतकश लोग हैं, न कि अपराध और नशा।
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