नई ‘स्पेस रेस’ का आगाज: चांद अब सिर्फ मंजिल नहीं, महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की जंग का नया मैदान

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नई दिल्ली(एजेंसी):व्यापार युद्ध और टैरिफ वॉर से दूर दुनिया एक बार फिर स्पेस की रेस के दौर में प्रवेश कर चुकी है। इस बार यह मुकाबला अमेरिका और चीन के बीच में है, और दोनों की मंशा चांद पर कब्जा जमाने की है। यह प्रतिस्पर्धा सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें भू-राजनीति, संसाधन और भविष्य की ऊर्जा का बड़ा खेल शामिल है।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने Artemis मिशन के जरिए 50 साल बाद इंसानों को चांद पर भेजने की तैयारी कर रही है। 2026 में Artemis-II मिशन के जरिए चांद के आसपास मानव मिशन सफल रहा। आने वाले सालों में Artemis-III और Artemis-IV मिशन के तहत चांद पर लैंडिंग और स्थायी बेस बनाने की योजना है।

अमेरिका का लक्ष्य सिर्फ चांद पर जाना नहीं, बल्कि वहां लंबे समय तक रहना और भविष्य में मंगल मिशन की तैयारी भी करना है।

2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चांद भेजेगा चीन

चीन भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। चीन का लक्ष्य 2030 तक अपने अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर उतारने का है। उसका उद्देश्य अंतरिक्ष में अपनी तकनीकी और रणनीतिक ताकत दिखाना है। चीन का फोकस चांद पर स्थायी उपस्थिति बनाना और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ाना है। यदि अमेरिका अपने मिशन की समयसीमा में देरी करता है तो संभवत: चीन पहले चंद्रमा पर पहुंच सकता है।

भारत की स्थिति क्या है?

स्पेस की रेस में मुख्य खिलाड़ी अमेरिका और चीन हैं, लेकिन भारत भी इस रेस में उभरता हुआ खिलाड़ी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने 2040 तक चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को उतारने का महत्वकांक्षी लक्ष्य रखा है। देश का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन, गगनयान, 2027 में प्रक्षेपण के लिए तैयार है।

चंद्रमा तक पहुंचने के लिए रॉकेट और प्रक्षेपण प्रणालियों से लेकर व्यापक अंतरिक्ष अवसंरचना तक, क्षमताओं में एक बड़ी छलांग की आवश्यकता होगी। भारत ने पहले ही इसकी नींव रखना शुरू कर दिया है, जिसमें अपने स्वयं के अंतरिक्ष स्टेशन की योजना भी शामिल है।

क्यों हो रही स्पेस की दौड़?

हीलियन-3, चांद की सबसे बड़ी दौलत है और नई स्पेस रेस की अहम वजह भी। यह एक दुर्लभ तत्व है, जो पृथ्वी पर बहुत कम लेकिन चांद पर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। भविष्य में यह स्वच्छ और शक्तिशाली ऊर्जा का बड़ा स्रोत बन सकता है। इसी वजह से चांद अब सिर्फ वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि ऊर्जा का खजाना बन गया है।

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