एक टिफिन लेकर पहुंचे मुंबई, 10 में से 9 बार हुए फेल; फिर ऐसे कबाड़ ने बदली तकदीर, आज जेब में ₹42 हजार करोड़

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नई दिल्ली(एजेंसी):वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल (Anil Agarwal Net Worth) एक सेल्फ-मेड अरबपति हैं, जिन्होंने साधारण शुरुआत से बड़े बिजनेसमैन बनने तक का सफर तय किया है। उनकी सफलता की कहानी काफी दिलचस्प है। अग्रवाल को अपने सफर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन आज उनकी नेटवर्थ 42,396 करोड़ रुपये है।

टिफिन लेकर पहुंचे मुंबई

अग्रवाल का जन्म 1954 में बिहार के पटना में एक मारवाड़ी परिवार में हुआ था। अनिल अग्रवाल अपने पिता को एक छोटा सा एल्युमिनियम कंडक्टर का बिजनेस चलाते देखते बड़े हुए। 19 साल की उम्र में, वे बिजनेस के मौके तलाशने के लिए मुंबई चले गए। वे मुंबई बस बिस्तर और टिफिन लेकर पहुंचे थे। मगर बाद में उन्होंने दुनिया के सबसे असरदार नेचुरल रिसोर्स ग्रुप में से एक की स्थापना की।

कबाड़ से की शुरुआत

मुंबई में अग्रवाल काफी कम खर्च में गुजारा करते थे और उन्होंने सड़क पर बिजनेस सीखा। उन्होंने शुरुआत स्क्रैप (कबाड़) के कारोबार से की। अग्रवाल ने कबाड़ की कीमतों पर मोलभाव करना सीखा, रोजाना के कैश फ्लो को मैनेज किया और कमोडिटी साइकिल को आसानी से समझा। उन्होंने यह सब तब किया जब फॉर्मल रिस्क मॉडल भी नहीं थे।

9 बार हुए फेल
अग्रवाल अक्सर असफलता को अपना सबसे अच्छा टीचर मानते हैं, और सबके सामने कहते हैं कि उनके पहले 10 वेंचर में से 9 फेल हो गए। इस ट्रायल-एंड-एरर फेज ने उनकी फिलॉसफी को बनाया – स्केल से ज्यादा कैपिटल एफिशिएंसी मायने रखती है और परफेक्शन से ज्यादा टाइमिंग। उन्हें अक्सर मेटल किंग भी कहा जाता है।

ये था पहला बड़ा कदम

अग्रवाल का पहला बड़ा कारोबारी कदम था 1976 में शमशेर स्टर्लिंग कॉर्पोरेशन नाम की एक छोटी कंपनी को खरीदना, जिसे एक मामूली बैंक लोन से फाइनेंस किया गया था। फिर जरूरत और स्ट्रेटेजिक समझ से प्रेरित होकर, उन्होंने 1986 में स्टरलाइट इंडस्ट्रीज की स्थापना की, जो एक ऐसी कंपनी थी, जिसने जल्द ही मेटल प्रोडक्शन में स्थापित कंपनियों को चुनौती दी।

कैसे मिली स्टरलाइट को सफलता?

स्टरलाइट को शुरुआती सफलता इनोवेशन और वर्टिकल इंटीग्रेशन से मिली। यह महसूस करते हुए कि मेटल की कीमतें ऊपर-नीचे हो रही हैं, अग्रवाल ने मेटल खरीदने के बजाय खुद ही उनका प्रोडक्शन शुरू कर दिया। 1993 तक, स्टरलाइट ने भारत का पहला प्राइवेट सेक्टर कॉपर स्मेल्टर और रिफाइनरी शुरू कर दी थी।
इसके बाद भारत एल्युमिनियम कंपनी (BALCO) और हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) में मेजोरिटी हिस्सेदारी खरीदने समेत कई एक्विजिशन ने भारतीय अर्थव्यवस्था के अहम सेक्टर में उनकी पहुंच बढ़ा दी।

फिर शुरू की वेदांता

2003 में, अग्रवाल ने लंदन में वेदांता रिसोर्सेज पीएलसी की शुरुआत करके एक स्ट्रेटेजिक कदम उठाया, जिसने इसे ग्लोबल कैपिटल मार्केट में जगह दिलाई। यह एक अहम पल था जब वेदांता लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट होने वाली पहली बड़ी भारतीय नेचुरल रिसोर्स कंपनियों में से एक बन गई।

ये रहे सक्सेस मंत्र

हाल के सालों में अग्रवाल की लीडरशिप ने बड़े पैमाने पर रीस्ट्रक्चरिंग पर फोकस किया है। उनकी बड़ी “3D स्ट्रैटेजी –” डीमर्जर, डाइवर्सिफिकेशन और डीलेवरेजिंग, का मकसद वेदांता को फोकस्ड सेक्टर एंटिटी (एल्युमिनियम, ऑयल एंड गैस, पावर, आयरन एंड स्टील, वगैरह) में बांटना है, ताकि शेयरहोल्डर्स के लिए वैल्यू अनलॉक हो और ऑपरेशनल फोकस और बेहतर हो।

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