काठमांडू(एजेंसी):नेपाल-चीन सीमा पर ग्लेशियर के ढहने से भयानक भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ में 1,100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इस आपदा से कुछ दिन पहले ही अस्थिरता के साफ संकेत दिखाई दिए थे। इस बात का खुलासा एक रिपोर्ट में हुआ है।
बचाई जा सकती थी बहुत से लोगों की जान
इन नतीजों ने दूर-दराज हिमालयी इलाके में ग्लेशियर से जुड़े खतरों के लिए काम करने वाले अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (समय से पहले चेतावनी देने वाले सिस्टम) की कमी पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर निचले इलाकों में ज्यादा बेहतर सिस्टम होता तो काफी लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
क्या पहले कोई चेतावनी वाले संकेत मिले थे?
CNN की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले हफ़्ते जारी HiRISK रिपोर्ट में ग्लेशियर के ढहने से पहले हुए भौतिक बदलावों और समय रहते उनका पता लगाने की संभावनाओं की जांच की गई। वैज्ञानिकों ने कहा, “बाद में देखने पर पता चला कि घटना से पहले कुछ संकेत मिले थे।”
उन्होंने साफ तौर पर भूरे रंग के पिघले पानी और एक ऐसी दरार की ओर इशारा किया जो ढहने से कुछ दिन पहले ही आस-पास की चट्टानी ढलान में फैल रही थी। हालांकि, दूर-दराज और बहुत ऊंचे इलाकों में ऐसे बदलावों का पता लगाना मुश्किल होता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन में कई ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए हाल ही में शुरुआती चेतावनी देने वाले सिस्टम लगाए गए थे, लेकिन जिस इलाके में ग्लेशियर ढहा वहां उससे जुड़े खतरों के लिए कोई खास सिस्टम काम नहीं कर रहा था।
एक बार जब ढहने की प्रक्रिया शुरू हुई तो शुरुआती भूस्खलन की रफ्तार इतनी तेज थी कि आम चेतावनी सिस्टम से सीमा पर मौजूद उस चेकपोस्ट को खाली करने के लिए शायद ही समय मिल पाता, जो सबसे पहले प्रभावित इलाकों में से एक था।
रिपोर्ट में किस बात पर दिया गया जोर?
हालांकि, नदी के बहाव की दिशा में आगे के इलाकों में प्रतिक्रिया देने के लिए शायद ज्यादा समय मिल सकता था। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ऐसे व्यापक अर्ली वार्निंग सिस्टम (समय से पहले चेतावनी देने वाले सिस्टम) होते जो 10 मिनट या उससे ज्यादा समय पहले चेतावनी दे सकते तो काफी लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
इस रिपोर्ट में ऐसे सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया गया है जो न सिर्फ ग्लेशियल झीलों, बल्कि अस्थिर ग्लेशियरों और आस-पास के पहाड़ी ढलानों पर भी नजर रख सकें और साथ ही यह भी पक्का करें कि निचले इलाकों में रहने वाले खतरे की चपेट में आए समुदायों तक चेतावनी पहुंच सके।
नहीं दिखा नेपाल-चीन के बीच तालमेल
चीन और नेपाल के अधिकारियों ने हाल ही में मई में इस क्षेत्र में प्राकृतिक खतरों की निगरानी पर सहयोग को मजबूत करने के लिए बैठक की थी। इस आपदा ने हिमालय में खतरों की निगरानी के लिए नेपाल और चीन के बीच बेहतर सहयोग की मांग को फिर से तेज कर दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सीमा-पार जानकारी साझा करना इसलिए भी बहुत जरूरी है क्योंकि पहाड़ी इलाकों में आने वाले खतरे सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों और बुनियादी ढांचे को तेजी से प्रभावित कर सकते हैं।
स्टिमसन सेंटर के एनर्जी, वॉटर एंड सस्टेनेबिलिटी प्रोग्राम में सीनियर फेलो ऑस्टिन लॉर्ड ने हाल ही में एक लेख में इस बात पर भी जोर दिया कि नेपाल और चीन के बीच बेहतर बातचीत, जानकारी साझा करने और सीमा-पार के खतरों के संयुक्त विश्लेषण की कितनी सख्त जरूरत है।
अन्य रिपोर्टों में भी जताई गई आपदा की संभावना
दूसरी रिपोर्टों में भी आपदा की संभावना पर जोर दिया गया है लेकिन HiRISK रिपोर्ट, मार्च 2026 में इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) द्वारा जारी की गई दो बड़ी रिपोर्टों से अलग है।
ICIMOD की रिपोर्ट में हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में लंबे समय से हो रहे बदलावों की जांच की गई और चेतावनी दी गई कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से क्रायोस्फीयर (बर्फ वाले इलाकों) से जुड़े खतरों का जोखिम बढ़ रहा है, जिसमें ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ भी शामिल है।
रिपोर्ट में पाया गया कि 1990 और 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय ग्लेशियरों ने अपने कुल क्षेत्रफल का लगभग 12 प्रतिशत और अनुमानित बर्फ के भंडार का 9 प्रतिशत हिस्सा खो दिया, जबकि 2000 के बाद ग्लेशियर की बर्फ के नुकसान की दर दोगुनी हो गई।
रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि इस क्षेत्र के सबसे छोटे ग्लेशियर खास तौर पर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। हिंदू कुश हिमालय के तीन-चौथाई ग्लेशियर 0.5 वर्ग किलोमीटर से कम आकार वाले हैं, जो उन्हें जोखिम वाली श्रेणी में रखता है। ICIMOD ने ग्लेशियर की निगरानी में मौजूद बड़ी कमियों की ओर भी इशारा किया।





















































