नई दिल्ली(एजेंसी):अहमदाबाद में 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में फंसे एक पुलिस कांस्टेबल को 28 साल बाद कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जब उन्हें न्याय मिला, तो वे बेहद खुश और भावुक थे। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि फैसले के कुछ ही घंटों बाद उनकी मौत हो गई। यह मामला न्याय में देरी और उसके असर पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मामला साल 1997 का है। अहमदाबाद के वेजलपुर इलाके में विशाल जंक्शन के पास एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने जाल बिछाया था। इस दौरान एक पुलिस कांस्टेबल पर 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया। ACB ने कांस्टेबल के खिलाफ मामला दर्ज किया और जांच शुरू हुई। इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा और कानूनी प्रक्रिया शुरू हो गई।
7 साल की सुनवाई और सजा
करीब सात साल तक केस निचली अदालत में चला। साल 2004 में अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने कांस्टेबल को दोषी करार दिया। अदालत ने उन्हें तीन साल की सजा सुनाई। इस फैसले के बाद उनका पुलिस करियर खत्म हो गया। साथ ही समाज में उनकी छवि को भी गहरा नुकसान पहुंचा।
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के फैसले के खिलाफ कांस्टेबल ने गुजरात हाईकोर्ट में अपील दायर की। यहां उनकी कानूनी लड़ाई बेहद लंबी चली। अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उन्हें करीब 22 साल तक हाईकोर्ट के चक्कर काटने पड़े।
28 साल बाद बाइज्जत बरी
घटना के पूरे 28 साल बाद गुजरात हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। इसके बाद कांस्टेबल को बाइज्जत बरी कर दिया गया। यह फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा सुकून लेकर आया।
हुई अचानक मौत
फैसला आने के बाद कांस्टेबल बेहद खुश और भावुक थे। वे अपने वकील नितिन गांधी के ऑफिस पहुंचे। उन्होंने कहा, “जीवन पर लगा कलंक अब मिट गया है, अब अगर भगवान बुला भी लें तो मुझे गम नहीं।“ शाम को जब वे घर लौटे, तो कुछ ही घंटों बाद उनकी मौत हो गई।





































