नई दिल्ली(एजेंसी):स्मार्टफोन की दुनिया में सब चीजें इतनी आसान हो गई हैं कि हम शॉर्टकट के आदि हो चुके हैं। यही वजह है कि जब भी हम किसी नई जगह पर जाते हैं तो सबसे पहले गूगल मैप खोलते हैं कि वो तो रास्ता बता ही देगा। ऐसे में हमारा दिमाग अपनी पूरी क्षमता के साथ काम ही नहीं कर पाता। पर बात सिर्फ दिमाग के काम करने की नहीं है, इससे भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है, जैसे याददाश्त का कमजोर होना और सोचने-समझने की क्षमता कम होते जाना। लेकिन अगर कोई बिना जीपीएस के खुद से रास्ते ढूंढने की कोशिश करता है तो साइंस भी मानता है कि यह उसके दिमाग के हिप्पोकैंपस हिस्से को एक्टिव रखने में मदद करता है। आइए जानते हैं क्या है हिप्पोकैंपस और कैसे खुद से रास्ता ढूंढना हिप्पोकैंपस को एक्टिव करता है।
क्या है हिप्पोकैंपस?
यह दिमाग का एक छोटा सा हिस्सा होता है, जिसका काम बड़ा है। हिप्पोकैंपस हमें सीखने और चीजें याद रखने में मदद करता है। इसका काम शॉर्ट टर्म मेमोरी को लॉंग टर्म मेमोरी में बदलना है। इसी के साथ, यह हमें अपने आसपास के वातावरण के बारे में जानने में भी मदद करता है। इसका दूसरा मतलब यह भी है कि आप अपने पास घटित हो रही चीजों के लिए कितने एक्टिव हैं। वर्बल मेमोरी बढ़ाना भी हिप्पोकैंपस का ही काम है।
रास्ता ढूंढने से हिप्पोकैंपस होता है एक्टिव
इसे लेकर कॉलेज लंदन यूके के न्यूरोलॉजिस्ट का कहना है कि जब हम किसी नए रास्ते पर जाते हैं तो हमारा दिमाग उस वातावरण को समझने के लिए एक्टिव हो जाता है और आसपास की जानकारी इकट्ठी करने लगता है। आइए जानते हैं GPS के बिना रास्ता ढूंढने के फायदे :
GPS के बिना रास्ता ढूंढने के फायदे
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दिमाग एक मानसिक नक्शा तैयार करता है, ताकि वो थोड़े समय की याद लंबे समय तक दिमाग में स्टोर कर पाए। आसान भाषा में समझें तो इससे विजुअल मेमोरी बढ़ती है।
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जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है लोग चीजें भूलने लगते हैं, इसे ही डिमेंशिया कहा जाता है। नई जगहों को एक्सप्लोर करने से यह खतरा बहुत कम हो जाता है।
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रास्ता ढूंढने में आ रही परेशानी का सामना करने, अपनी सूझबूझ से या लोगों से मदद लेकर चीजें सुलझाने से प्रॉब्लम सॉलविंग स्किल्स भी बेहतर होती जाती है।
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इससे भविष्य में मुश्किल परिस्थितियों से सामना करने के लिए आत्मविश्वास भी मिलता है।







